गुरुवार, 4 सितंबर 2025

अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप Ati Ka Bhala Na Bolana Ati Kee BhaleeNa Choop Kabir Das

 



दोहा:
अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप।
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।

अर्थ और व्याख्या:

शब्दार्थ:

  1. अति: आवश्यकता से अधिक, अतिरेक
  2. भला: अच्छा
  3. बोलना: कहना, वार्तालाप करना
  4. चूप: चुप रहना
  5. बरसना: बारिश होना
  6. धूप: सूर्य का प्रकाश और गर्मी

व्याख्या:

यह दोहा संत कबीर द्वारा जीवन में संतुलन और संयम के महत्व को दर्शाने के लिए कहा गया है। इसमें ‘अति’ यानी किसी भी चीज़ की अधिकता को हानिकारक बताया गया है। संत कबीर का कहना है कि किसी भी वस्तु, व्यवहार, या स्थिति में अति होना नुकसानदायक हो सकता है। वे यह संदेश देते हैं कि जीवन में संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।

  1. अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप:
    यहाँ पर ‘बोलना’ और ‘चूप’ दो परस्पर विरोधी क्रियाएं हैं। कबीर कहते हैं कि अधिक बोलना अच्छा नहीं है क्योंकि अधिक बोलने से कभी-कभी व्यक्ति ऐसी बातें कह जाता है, जो दूसरे को चोट पहुँचा सकती हैं या उसका स्वयं का अनादर करवा सकती हैं। वहीं, अधिक चुप रहना भी सही नहीं है क्योंकि इससे व्यक्ति के विचार और भावनाएं दब जाती हैं, जिससे उसके व्यक्तित्व और संबंधों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसलिए, बोलने और चुप रहने के बीच संतुलन बनाए रखना चाहिए। न तो हर समय बोलते रहें और न ही हमेशा चुप रहें।

  2. अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप:
    प्रकृति के दो महत्वपूर्ण तत्व - वर्षा और धूप - का उदाहरण देकर कबीर यह समझाने का प्रयास करते हैं कि इनकी अति भी हानिकारक हो सकती है। आवश्यकता से अधिक वर्षा होने पर बाढ़ आ सकती है, जो फसलों और जीवन को नुकसान पहुँचाती है। वहीं, अत्यधिक धूप से सूखा पड़ सकता है, जिससे भूमि बंजर हो जाती है और जीवन प्रभावित होता है। अतः, जैसे प्रकृति का संतुलन आवश्यक है, वैसे ही जीवन के हर क्षेत्र में संतुलन बनाए रखना ज़रूरी है।

संदेश:

इस दोहे के माध्यम से कबीर हमें यह सिखाते हैं कि जीवन में किसी भी चीज़ की अति, चाहे वह बोलना हो, चुप रहना हो, या प्रकृति के तत्व हों, लाभकारी नहीं है। हमें हर क्षेत्र में मध्यम मार्ग अपनाना चाहिए।

  • अधिक बोलने से विवाद और समस्याएं बढ़ती हैं, जबकि अधिक चुप रहने से व्यक्तित्व दब जाता है।
  • अत्यधिक वर्षा और धूप से प्रकृति का संतुलन बिगड़ता है, वैसे ही जीवन में किसी भी चीज़ की अधिकता से सुख और शांति खत्म हो जाती है।

निष्कर्ष:

संत कबीर का यह दोहा हमें सिखाता है कि संतुलन और संयम जीवन के हर पहलू में आवश्यक हैं। ‘अति’ को त्यागकर हम न केवल अपने जीवन को सुखमय बना सकते हैं, बल्कि दूसरों के साथ भी मधुर संबंध बना सकते हैं। संतुलित जीवन ही सच्चे सुख और शांति का आधार है।

मंगलवार, 18 मार्च 2025

आए हैं सो जाएँगे राजा रंक फकीर Aaye Hain So Jayenge Raja Rank Fakeer

 



आए हैं सो जाएँगे, राजा रंक फकीर।
एक सिंहासन चढ़ि चले, एक बँधे जात जंजीर॥

(Translation in English)

"Aaye hain so jayenge, raja rank fakeer,
Ek singhasan chadhi chale, ek bandhe jaat janjeer."


शब्दार्थ (Word Meanings)

  • आए हैं (Aaye hain) – जो जन्म ले चुके हैं (those who have been born)
  • सो जाएँगे (So jayenge) – मृत्यु को प्राप्त होंगे (will eventually die)
  • राजा (Raja) – राजा (king)
  • रंक (Rank) – गरीब व्यक्ति (poor person)
  • फकीर (Fakeer) – संन्यासी, भिक्षुक (hermit, beggar)
  • सिंहासन (Singhasan) – राजा का राजसिंहासन (royal throne)
  • जंजीर (Janjeer) – बेड़ियाँ, बंधन (chains, shackles)


भावार्थ (Meaning)

इस दोहे का मूल संदेश यह है कि संसार में हर व्यक्ति, चाहे वह राजा हो, गरीब हो या फकीर, मृत्यु के नियम से परे नहीं है। जीवन की अस्थिरता और नश्वरता को दर्शाते हुए, यह दोहा हमें बताता है कि जन्म लेने वाला प्रत्येक व्यक्ति एक न एक दिन मृत्यु को प्राप्त होगा। कोई वैभवशाली जीवन जीकर राजसिंहासन पर बैठा होता है, तो कोई बंधनों में जकड़ा हुआ कठिनाइयों का सामना कर रहा होता है, लेकिन अंततः सभी को इस संसार से जाना होता है।


पंक्ति-दर-पंक्ति विश्लेषण (Line-by-Line Explanation)

1. आए हैं सो जाएँगे, राजा रंक फकीर।

इस पंक्ति में जीवन की नश्वरता (impermanence) को प्रमुख रूप से दर्शाया गया है। दुनिया में जो भी आया है, वह एक दिन अवश्य जाएगा। यह नियम राजा के लिए भी वैसा ही है, जैसा कि एक साधारण व्यक्ति या फकीर के लिए। जीवन और मृत्यु का यह सत्य किसी के लिए भी भिन्न नहीं होता।

  • राजा (King) – वह व्यक्ति जो सत्ता और वैभव से घिरा हुआ है।
  • रंक (Poor person) – एक ऐसा व्यक्ति जो जीवनभर गरीबी में जीता है।
  • फकीर (Hermit/Beggar) – वह जो सांसारिक मोह से दूर संन्यासी जीवन व्यतीत करता है।

इन सभी का अंत समान है, चाहे उनका जीवन कितना भी अलग क्यों न हो। यह पंक्ति हमें अहंकार, भौतिक सुख-संपत्ति और जीवन के अस्थायित्व का बोध कराती है।

2. एक सिंहासन चढ़ि चले, एक बँधे जात जंजीर॥

दूसरी पंक्ति जीवन के असमान पहलुओं को उजागर करती है।

  • "एक सिंहासन चढ़ि चले" – यहाँ राजा का संदर्भ है, जो राजसी वैभव के साथ जीवन व्यतीत करता है और मृत्यु को प्राप्त होता है।

  • "एक बँधे जात जंजीर" – वहीं दूसरी ओर, एक गरीब या अपराधी जंजीरों में बंधा हुआ जीवन समाप्त करता है।

इस पंक्ति का सार यह है कि लोगों के जीवन और मृत्यु की परिस्थितियाँ अलग-अलग हो सकती हैं, लेकिन मृत्यु की वास्तविकता सभी के लिए समान रहती है। यह हमें भौतिकता से ऊपर उठने और सच्चे जीवन मूल्यों को अपनाने की प्रेरणा देती है।


निष्कर्ष (Conclusion)

यह दोहा संत कबीर के विचारों की झलक देता है, जो हमें मृत्यु और जीवन की वास्तविकता का बोध कराता है। यह हमें बताता है कि संसार की समस्त वस्तुएँ अस्थायी हैं, और इसलिए हमें अहंकार, धन, सत्ता और भौतिक सुखों के पीछे भागने के बजाय सच्चे मानव मूल्यों को अपनाना चाहिए। यह संदेश हमें जीवन के प्रति एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाने और अपने कर्मों को सही दिशा में मोड़ने के लिए प्रेरित करता है।


सोमवार, 27 जनवरी 2025

कबीरा ते नर अन्ध हैं, गुरु को कहते और। Kabeera Te Nar Andh Hain, Guru Ko Kahate Aur

 

कबीरा ते नर अन्ध हैं, गुरु को कहते और। हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रुठै नहीं ठौर ॥

दोहा:

कबीरा ते नर अन्ध हैं, गुरु को कहते और।
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रुठै नहीं ठौर ॥

शब्दार्थ:

  • कबीरा: कबीरदास जी
  • ते: वे
  • नर: मनुष्य
  • अन्ध: अंधे, जो ज्ञान से अज्ञानी हैं
  • गुरु: शिक्षक, मार्गदर्शक
  • कहते: कहते हैं
  • और: और
  • हरि: भगवान
  • रूठे: नाराज होना
  • ठौर: स्थान, आसरा

अर्थ:
कबीरदास जी इस दोहे में यह संदेश दे रहे हैं कि जो व्यक्ति गुरु की महिमा और महत्व को समझने में असमर्थ हैं, वे अंधे की तरह होते हैं। वे कहते हैं कि यदि भगवान नाराज हो जाएं तो गुरु उनका आसरा होते हैं, लेकिन यदि गुरु नाराज हो जाएं तो किसी भी स्थान का कोई महत्व नहीं रह जाता।

व्याख्या:

पंक्ति 1: "कबीरा ते नर अन्ध हैं, गुरु को कहते और।
कबीरदास जी इस पंक्ति में यह संकेत दे रहे हैं कि जो लोग गुरु की वास्तविकता को नहीं समझ पाते, वे अंधे के समान होते हैं। अंधे का अर्थ है, जो किसी वस्तु या मार्ग को देख नहीं सकते, वही लोग गुरु के महत्व को नहीं पहचान पाते। उनका मन अज्ञानता से भरा होता है, और वे गुरु को केवल एक साधारण व्यक्ति के रूप में मानते हैं। ये लोग सत्य और ज्ञान के प्रति अज्ञानी होते हैं और उनका जीवन अंधकार में डूबा रहता है। गुरु का सही मूल्यांकन और आस्था जरूरी है ताकि जीवन में सही मार्गदर्शन प्राप्त हो सके।

पंक्ति 2: "हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रुठै नहीं ठौर।"
इस पंक्ति में कबीरदास जी यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि जब भगवान (हरि) नाराज होते हैं, तो गुरु ही हमारे लिए एक स्थान और आश्रय प्रदान करते हैं। भगवान से मिलन और मोक्ष की प्राप्ति गुरु के माध्यम से होती है। गुरु के बिना भगवान तक पहुंचना असंभव है। वहीं, यदि गुरु रुठ जाएं, तो हमारे जीवन में कहीं भी ठिकाना नहीं होता, क्योंकि गुरु के मार्गदर्शन से ही जीवन में सही दिशा मिलती है। गुरु के बिना जीवन में शांति और संतोष का अभाव रहता है।

समाप्ति:
कबीरदास जी ने इस दोहे के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि जीवन में गुरु का स्थान सर्वोपरि है। यदि गुरु हमारे जीवन में न हों, तो हम जैसे अंधे होते हैं, जो अपने मार्ग को नहीं देख सकते। गुरु ही हमें ज्ञान की रोशनी दिखाते हैं और जीवन को सही दिशा में ले जाते हैं। भगवान के नाराज होने पर गुरु ही हमारी रक्षा करते हैं, लेकिन यदि गुरु रुठ जाएं तो हमारा जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। इस प्रकार, हमें गुरु के प्रति अपनी श्रद्धा और आस्था बनाए रखनी चाहिए।

कबिरा माला मनहि की, और संसारी भेख Kabira Maala Manahi Kee, Aur Sansaaree Bhekh

कबिरा माला मनहि की, और संसारी भेख। माला फेरे हरि मिले, गले रहट के देख॥


 दोहा:

कबिरा माला मनहि की, और संसारी भेख।
माला फेरे हरि मिले, गले रहट के देख॥

शब्दों का अर्थ:

  1. कबिरा: यहां कबीर, भारतीय संत कवि और समाज सुधारक की ओर इशारा है।
  2. माला: यह माला एक साधना की चिह्न है, जिसका उपयोग साधक ईश्वर का नाम जपने के लिए करते हैं।
  3. मनहि: मन में या हृदय में।
  4. संसारी: संसार से संबंधित या सांसारिक जीवन।
  5. भेख: यह शब्द व्यक्ति के पहनावे और उसके बाहरी रूप से संबंधित है।
  6. फेरे: माला के मनकों को घुमाना।
  7. हरि: भगवान, ईश्वर का प्रतीक।
  8. गला: गला, गर्दन का एक हिस्सा।
  9. रहट: यह लकड़ी की एक मशीन होती है, जो पानी निकालने के काम आती है, जो आमतौर पर खेतों में होती है।

अर्थ: कबीर के इस दोहे में उन्होंने धार्मिक आस्थाओं और बाहरी दिखावे पर जोर देने वाले लोगों की आलोचना की है। कबीर जी का कहना है कि माला जपने से सच्ची भक्ति और आत्मा की शुद्धि नहीं होती। बाहरी रूप से जो धार्मिक आचरण या दिखावा करते हैं, वह कोई वास्तविक धर्म नहीं है। असली भक्ति तो मन में बसने वाली होती है, जो हर कार्य में ईश्वर का ध्यान और समर्पण लाती है।

व्याख्या:

पहली पंक्ति: "कबिरा माला मनहि की, और संसारी भेख।"
इस पंक्ति में कबीर जी कह रहे हैं कि माला तो केवल एक साधन है, जो मनुष्य को ध्यान में स्थिर रहने में मदद करती है, लेकिन यह केवल बाहरी दिखावा है। असली माला तो मन में होती है, यानी जब व्यक्ति का मन शुद्ध हो, तब वह वास्तविक भक्ति करता है। बाहर से धर्म का दिखावा करने से कोई लाभ नहीं होता। यदि मन में पवित्रता नहीं है, तो माला या भेष किसी काम का नहीं है। कबीर जी ने यह स्पष्ट किया कि आत्मा की शुद्धि और भगवान के प्रति प्रेम को बाहरी आडंबरों से नहीं जोड़ा जा सकता।

दूसरी पंक्ति: "माला फेरे हरि मिले, गले रहट के देख॥"
कबीर जी दूसरी पंक्ति में यह कह रहे हैं कि अगर माला के मनकों को घुमाने से ईश्वर मिलते तो गले में रहट जैसा यंत्र लगाने से भी ईश्वर मिल जाते। उन्होंने यहां साधारण शब्दों में बताया कि ईश्वर की प्राप्ति केवल बाहरी दिखावे से नहीं होती, बल्कि वह सच्चे भक्ति और समर्पण के माध्यम से होती है। जैसे रहट के गले में लगे होने से कोई नदियों से पानी निकाल सकता है, वैसे ही अगर कोई बिना सच्चे भक्ति के साधन पर जोर दे, तो यह केवल दिखावा होता है।

कुल मिलाकर, कबीर जी का यह दोहा हमें यह समझाता है कि असली भक्ति तो केवल मन में होती है।
धार्मिक आस्थाओं और साधनाओं का महत्व केवल तब तक है जब तक वे सच्चे मन से की जाती हैं। किसी भी धर्मिक कर्म को बिना सच्चे भाव के करना केवल छलावा है। कबीर जी का संदेश था कि हर व्यक्ति को आत्मा की शुद्धि की ओर अग्रसर होना चाहिए, क्योंकि असली भक्ति मन से जुड़ी होती है, न कि बाहरी आडंबरों से।

समाप्ति:
कबीर जी के इस दोहे में हमें यह शिक्षा मिलती है कि धर्म का सही मतलब है आत्मिक शुद्धि और ईश्वर के प्रति सच्चा प्रेम। केवल बाहरी रूप से धर्मिक कार्य करने से ईश्वर की प्राप्ति नहीं होती। हमें अपने भीतर के संसार की सफाई करनी चाहिए। कबीर जी ने हमें अपने मन की माला पर ध्यान केंद्रित करने का संदेश दिया।

हँस हँस कंत न पाया ,जिन पाया तिन रोय Hans Hans Kant Na Paaya ,Jin Paaya Tin Roy

 

हँस हँस कंत न पाया ,जिन पाया तिन रोय, हंसि खेले पिया बिन ,कौन सुहागन होय।

दोहा

हँस हँस कंत न पाया ,जिन पाया तिन रोय, हंसि खेले पिया बिन ,कौन सुहागन होय।

शब्दार्थ

  1. हँस हँस – हंसते हुए, मस्ती में।

  2. कंत – पति, प्रियतम।

  3. पाया – प्राप्त किया।

  4. रोय – रोया।

  5. पिया – प्रियतम।

  6. सुहागन – सौभाग्यवती स्त्री, जिसके पति जीवित हैं।

सरल अर्थ

जो लोग जीवन को केवल हँसी-खुशी में बिताते हैं, उन्हें अपने प्रियतम (ईश्वर या सच्चे सुख) की प्राप्ति नहीं होती। जिन लोगों ने अपने प्रियतम को प्राप्त किया है, उन्हें इसे पाने के लिए कठिन संघर्ष करना पड़ा है। पति (प्रियतम) के बिना हँसते-खेलते रहना और स्वयं को सौभाग्यवती मानना असंभव है।

विस्तृत व्याख्या

यह दोहा कबीरदास जी का गहरा आध्यात्मिक संदेश देता है। इसमें वे जीवन और आत्मिक साधना के महत्व को समझाते हैं। यह दोहा न केवल सांसारिक जीवन के पहलुओं को छूता है, बल्कि आत्मज्ञान और ईश्वर-प्राप्ति के लिए किए जाने वाले प्रयासों की भी चर्चा करता है। आइए इसे गहराई से समझते हैं:

प्रथम पंक्ति: हँस हँस कंत न पाया, जिन पाया तिन रोय

कबीरदास जी इस पंक्ति में बताते हैं कि जो लोग केवल सुख, मस्ती और हंसी में अपना समय व्यतीत करते हैं, वे अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य – ईश्वर की प्राप्ति या अपने प्रियतम – को हासिल नहीं कर पाते।

जो लोग इस उद्देश्य को प्राप्त कर चुके हैं, उन्होंने इस मार्ग पर बहुत कठिनाइयों और त्याग का सामना किया है। यह मार्ग साधना, संयम और आत्मिक संघर्ष से भरा होता है। इसलिए, जीवन का आनंद केवल बाहरी सुखों में ढूंढने वाले लोग इस गूढ़ सत्य को समझने में असमर्थ रहते हैं।

द्वितीय पंक्ति: हंसि खेले पिया बिन, कौन सुहागन होय

दूसरी पंक्ति में कबीरदास जी स्पष्ट करते हैं कि अपने प्रियतम (पति या ईश्वर) के बिना कोई भी स्त्री (या साधक) सौभाग्यशाली नहीं हो सकती। यहां ‘पिया’ प्रतीक है ईश्वर या आत्मिक चेतना का। जब तक आत्मा अपने परमात्मा से नहीं मिलती, तब तक वास्तविक सुख या संतोष असंभव है।

यहां ‘सुहागन’ शब्द का प्रयोग इस बात को दर्शाने के लिए किया गया है कि सच्चा सुख और पूर्णता तभी संभव है जब आत्मा अपने स्रोत (ईश्वर) से जुड़ जाती है।

निष्कर्ष

इस दोहे के माध्यम से कबीरदास जी यह संदेश देते हैं कि जीवन को केवल बाहरी हंसी-खुशी में व्यर्थ नहीं करना चाहिए। सच्चे सुख और ईश्वर की प्राप्ति के लिए आत्मिक साधना, त्याग और संघर्ष आवश्यक है। बिना आत्मिक उद्देश्य के जीवन अधूरा है। यह दोहा हमें अपने जीवन में गहराई और अर्थ को समझने के लिए प्रेरित करता है।

साधु कहावत कठिन है , लम्बा पेड़ खजूर saadhu kahaavan kathin hai, lamba ped khajoor Kabir Das


 

साधु कहावत कठिन है, लम्बा पेड़ खजूर।

चढ़े तो चाखे प्रेम रस, गिरे तो चकनाचूर।।

कहीं कहीं यह दोहा इस प्रकार भी लिखा गया है:

साधु कहावन कठिन है, लम्बा पेड़ खजूर।
चढ़े तो चाखै प्रेम रस, गिरै तो चकनाचूर।।

शब्दार्थ:

  1. साधु: संत, सज्जन, विद्वान।

  2. कहावत/कहावन: प्रसिद्ध उक्ति, प्राचीन कहानियों से निकली शिक्षा।

  3. कठिन: कठिनाई भरा, चुनौतीपूर्ण।

  4. लम्बा: ऊँचा, ऊर्ध्वमुखी।

  5. खजूर: एक प्रकार का पेड़ जो ऊँचा होता है और उसके फल मीठे होते हैं।

  6. चाखे/चाखै: स्वाद लेना, अनुभव करना।

  7. प्रेम रस: प्रेम, आनंद और शांति का अनुभव।

  8. चकनाचूर: पूरी तरह से टूट जाना, बिखर जाना।


सरल अर्थ:

यह दोहा यह कहता है कि साधु बनना या उसकी संगति प्राप्त करना बहुत कठिन है, जैसे खजूर के पेड़ पर चढ़ना। खजूर के पेड़ पर चढ़ने पर मीठे फल का स्वाद तो मिलता है, लेकिन गिरने पर व्यक्ति पूरी तरह बिखर जाता है।


पूर्ण व्याख्या:

इस दोहे में साधु, संत और उनके जीवन की कठिनाई की तुलना खजूर के पेड़ से की गई है। खजूर का पेड़ बहुत ऊँचा और सीधा होता है। उस पर चढ़ना बेहद कठिन होता है, और यदि कोई चढ़ भी जाए तो फल तक पहुँचकर प्रेम और शांति का स्वाद ले सकता है। साधु का जीवन भी ऐसा ही होता है। साधु बनने का अर्थ है तमाम सांसारिक मोह-माया से मुक्त होना, जो बहुत कठिन है।

यदि कोई व्यक्ति साधु के बताए मार्ग पर चलता है, तो उसे प्रेम, शांति और आनंद का अनुभव होता है। परंतु यदि साधना में कोई चूक हो जाए या व्यक्ति अपने मार्ग से विचलित हो जाए, तो उसका जीवन बिखर सकता है।

इस दोहे का मुख्य उद्देश्य यह बताना है कि जीवन में महान कार्य, जैसे संत बनना या आध्यात्मिकता की राह पर चलना, आसान नहीं होते। यदि व्यक्ति इस कठिन मार्ग को पार कर लेता है, तो उसे अनमोल आनंद की प्राप्ति होती है। लेकिन, इस मार्ग में असफलता का अर्थ है गिरकर पूरी तरह टूट जाना।

यह दोहा हमें यह शिक्षा देता है कि हमें जीवन में कठिनाइयों का सामना करने से नहीं डरना चाहिए। बल्कि, हमें पूरी दृढ़ता और विश्वास के साथ अपने लक्ष्य की ओर बढ़ना चाहिए। यदि हम अपने प्रयास में सफल होते हैं, तो हमें अद्भुत आनंद की प्राप्ति होगी।


निष्कर्ष:

इस दोहे के माध्यम से यह बताया गया है कि साधु का जीवन और उनकी शिक्षा को अपनाना आसान नहीं है। यह कार्य एक चुनौतीपूर्ण यात्रा की तरह है, जो साहस, धैर्य और दृढ़ संकल्प की माँग करती है। इस यात्रा का फल मीठा और सुखदायक है, लेकिन असावधानी विनाशकारी हो सकती है।

शुक्रवार, 24 जनवरी 2025

 



कबीर सो धन संचे, जो आगे को होय।

सीस चढ़ाए पोटली, ले जात न देख्यो कोय।।



कबीरदास जी की यह साखी हमारे जीवन को एक गहरी शिक्षा देती है। इसका अर्थ है कि हमें ऐसा धन संचित करना चाहिए जो हमारे भविष्य के लिए उपयोगी हो और आध्यात्मिक रूप से हमें लाभ दे। सांसारिक धन, संपत्ति, और वस्त्र केवल इस भौतिक संसार में ही सीमित रहते हैं। मृत्यु के बाद, यह सब यहीं रह जाता है और मनुष्य खाली हाथ जाता है।

इस साखी में कबीरदास जी यह संदेश दे रहे हैं कि भौतिक धन का संग्रह करने में अपना पूरा जीवन बर्बाद मत करो। संसार में जितने भी धन, संपत्ति और वैभव हैं, वे केवल इस जीवन तक सीमित हैं। जब मनुष्य इस संसार को छोड़कर जाता है, तो वह अपने साथ कुछ भी नहीं ले जा सकता।

कबीर जी यहाँ "धन" शब्द को आध्यात्मिक दृष्टिकोण से परिभाषित कर रहे हैं। यह धन सत्य, धर्म, भक्ति, परोपकार, और सद्गुण हैं। ऐसे गुण और कर्म ही मृत्यु के बाद हमारे साथ जाते हैं और आत्मा को मुक्ति प्रदान करते हैं। सांसारिक धन जैसे सोना, चांदी, या जमीन-जायदाद मृत्यु के समय काम नहीं आते।

"सीस चढ़ाए पोटली" का अर्थ है कि मनुष्य अपने जीवन के अंत में चाहे कितनी भी दौलत अपने सिर पर उठाए, उसे वह परलोक में नहीं ले जा सकता। यह एक कटाक्ष है उन लोगों पर, जो केवल सांसारिक संपत्ति के पीछे भागते हैं और आत्मा की शुद्धि की ओर ध्यान नहीं देते।

कबीरदास जी इस साखी के माध्यम से हमें यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि हमें अपनी प्राथमिकताएं बदलनी चाहिए। हमारा ध्यान केवल भौतिक सुखों पर नहीं बल्कि आध्यात्मिक सुख और आत्मा की उन्नति पर होना चाहिए।

इस साखी का व्यावहारिक संदेश यह है कि हमें अपने जीवन में संतुलन बनाना चाहिए। सांसारिक जिम्मेदारियों को निभाने के साथ-साथ हमें अच्छे कर्म करने चाहिए, सच्चाई का मार्ग अपनाना चाहिए और अपने अंदर आध्यात्मिक गुणों का विकास करना चाहिए।

यदि हम केवल धन और सांसारिक चीज़ों के पीछे भागते रहेंगे, तो अंत में हमें खाली हाथ रहना पड़ेगा। लेकिन यदि हम सत्य, प्रेम, और धर्म के रास्ते पर चलेंगे, तो हमें न केवल इस जीवन में शांति मिलेगी, बल्कि परलोक में भी हमारी आत्मा को मुक्ति और शांति प्राप्त होगी।

इसलिए कबीरदास जी हमें प्रेरित करते हैं कि हम ऐसा धन संचित करें जो हमारे आत्मिक जीवन को समृद्ध बनाए। सांसारिक वस्त्र और संपत्ति तो नाशवान हैं, लेकिन अच्छे कर्म और आध्यात्मिक ज्ञान अमर हैं। यही हमारे जीवन का वास्तविक धन है।

रविवार, 10 जुलाई 2016

Sant Kabir Das



  संत कबीर दास


kabir das ji


हिंदी साहित्य का भक्ति काल 1375  से 1700  तक माना जाता है यह हिंदी साहित्य का सुवर्णीय यूग माना जाता   है, इस ही काल में निर्गुण भक्ति की ज्ञानाश्रयी शाखा के मुख्य कवियों में से एक है  संत श्री कबीर दास जी 


इन  के जन्म के बारे में निचित  नहीं  कहा जा सकता  है इन का  जन्म संवत 1456 के आसपास कशी में  हुआ था 


ऐसा कहा गया है के  श्री रामानन्द स्वामी ने भूल से एक  विधवा ब्राह्मणी का पुत्रवती होने का आशीर्वाद दिया था ब्राह्मणी ने  उस नवजात शिशु को लहरतारा ताल के पास छोड़  आयी वही नीरू और नीमा नामक जुलाहा जो के मुस्लिम थे उस  बच्चे  को उठाया  और उसका पालन किया जो आगे चल के संत कबीर दास जी कहलाए

जाति जुलाहा नाम कबीरा
बनि बनि फिरो उदासी



संत कबीरदास जी भक्ति कालीन कवि थे, यह कहना गलत न होगा के व् एक क्रांतिकारी, समाज सुधारक और निर्गुण ईश्वर भक्त थे,उन्होंने अपने दोहो, कविताओ का प्रयोग  समाज सुधार व् समाज में फैले पाखण्ड, आडंबरों  तथा भ्रान्तियों को दूर करने के लिए  किया हालाँकि  कबीर जी ने कहीं से भी शिक्षा ग्रहण नहीं की थी 

मसि कागद छूवो नहीं, कलम गही नहिं हाथ


कहते हैं कि, उन्हें अक्षर ज्ञान भी नहीं था । फिर भी उनकी कविता दोहे इतने प्रभावी थे की सीधे दिल और दिमाग में छा जाते बैठे  जाते है  न केवल उस काल में बल्कि  आज भी  उतना ही असर रखते है 

कबीरदास जी की रचनाएँ सखी , सबद और बीजक में  उपलब्द है कबीर जी ने अपनी रचनाओं में में खड़ी बोली, पंजाबी, गुजराती, राजस्थाना ब्रज तथा अवधि के शब्द प्रयोग किया है 

उस समय ऐसा  माना  जाता था के  काशी में मृत्यु होने से स्वर्ग और मगहर नामक स्थान में मृत्यु होने से नर्क मिलता है इस अंधविश्वास को समाप्त करने के उद्देश्य से कबीरदास जी मृत्यु से पहले मगहर चले गए और वहीं उनका देहान्त हो गया 




SANT KABIR DASS JI





उन्होंने भी जान कर ही कहा है, औरों ने भी जानकर ही कहा है-लेकिन कबीर के कहने का अंदाजे बयां, कहने का ढंग, कहने की मस्ती बड़ी बेजोड़ है। ऐसा अभय और ऐसा साहस और ऐसा बगावती स्वर, किसी और का नहीं है।   OSHO 

sant kabir dass
Sant Kabir Dass





संत कबीर दास के दोहे


हिन्दू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना

आपस में दोउ लड़ी-लड़ी  मरे, मरम न जाना कोई

मरम = भेद 


परनारी का राचणौ, जिसकी लहसण की खानि

खूणैं बेसिर खाइय, परगट होइ दिवानि

परनारी = दूसरी नारी ,पराई औरत  
खूणैं बेसिर = कोने में बैठ के 


केस कहा बिगडिया, जे मुंडे सौ बार
  मन को काहे न मूंडिये, जा में विशे विकार


केस = बाल , मुंडे = सर के सारे बाल साफ करना 
जा में विशे विकार= जिस में अच्छे विचार न हो 


माटी कहे कुम्हार से तू क्या रौंदे मोय 
एक दिन ऐसा आएगा मैं रौंदूगी तोय 


साईं इतना दीजिए जा मे कुटुम समाय
मैं भी भूखा न रहूं साधु ना भूखा जाय


बडा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर
पंथी को छाया नहीं फल लागे अति दूर


बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिलिया कोय
जो मन  खोजा आपना मुझसे बुरा न कोय


पोथी पढ़ - पढ़ जग मुआ भया न पंडित कोय
ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय


माला फेरत जुग भया फिरा न मन का फेर
कर का मनका डार दे मन का मनका फेर

कर = हाथ , डार = छोड़ 

जात  न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान

म्यान = जिस में तलवार रखी जाती है 


जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ
मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ

गहरे पानी पैठ = गहरे पानी का तला,    बपुरा = बेचारा 

बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि
हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि


अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप

चूप = चुप रहना, 

धीरे-धीरे रे मना,धीरे सब कुछ होय

माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय

धीरे-धीरे रे मना = अपने मन को धीरे-धीरे मनाए (समझाए )
माली सींचे सौ घड़ा = माली कई 100  घड़े पानी से पेड़ को पानी देता है 


निंदक नियरे राखिए, आँगन  कुटी छवाय
बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय


आँगन  कुटी छवाय = आँग में कुटिया बना के देना 
सुभाय = सुभाव 


दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार
तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार

दुर्लभ = जो कठिनता से प्राप्त होता हो
तरुवर = पेड़

बहुरि न लागे डार = फिर से डाल पर नही लगता 

कबीरा खड़ा बाज़ार में, मांगे सबकी खैर
ना काहू से दोस्ती,न काहू से बैर
बैर = दुश्मनी 


हाड़ जलै ज्यूं लाकड़ी, केस जलै ज्यूं घास
तन जलता देखि करि, भया कबीर उदास 
हाड़ = हड्डिया , केस = बाल 




कबीर तन पंछी भया, जहां मन तहां उडी जाइ
जो जैसी संगती कर, सो तैसा ही फल पाइ  


तन को जोगी सब करें, मन को बिरला कोई
सब सिद्धि सहजे पाइए, जे मन जोगी होइ  


माया मुई न मन मुआ, मरी मरी गया शरीर 
आशा  तिर्ष्णा  न मुई, यों कही गए कबीर 


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कबीर तीनो  लोक सब राम जपत हें, जान मुक्क्ति को धाम
राम चन्द्र वसिष्ट गुरु किया तिन कहि सुनायो नाम

कबीर तीन लोक पिंजरा भया, पाप पुण्य दो जाल
सभी जीव भोजन भये, एक खाने वाला काल

कबीर मानुष जन्म पाय कर, नहीं रटे हरी नाम
जैसे कुआँ जल बिना खुदवाया किस काम


चलती चक्की देखकर दिया कबीरा रोय
 दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय


साधू कहावन कठिन है लम्बा पेड़ खजूर
चढ़े तो चखे प्रेम रस गिरे तो चकनाचूर

आए है तो जाएगे राजा रंक फाकिर 
एक सिंहासन चढी चले एक बाधे जंजिर



कबीर कहा गरबियो काल गहे कर केस
ना जाने कहाँ मारिसी कै घर कै परदेस

कंकड़ पत्थर जोड़कर  मस्जिद लियो बनाये 
चढ़ कर मुलाह बांग दे  क्या बहरा हुआ खुदाए 

कबिरा गरब न कीजिये कबहूँ न हंसिये कोय
अबहूँ नाव समुद्र में का जाने का होय

काल करे सो आज कर आज करे सो अब
पल में प्रलय होएगी बहुरि करेगो कब

कुटिल वचन सबतें बुरा जारि करै सब छार
साधु वचन जल रूप है बरसै अमृत धार

धीरे-धीरे रे मना धीरे सब कुछ होय,
माली सींचे सौ घड़ा ॠतु आए फल होय

देवी बड़ी ना देवता  सूरज बड़ा ना चन्द 
आदि अंत दोनों बड़े  के गुरु के गोविन्द 


माला फेरूँ ना हरी भजूं मुख से कहूँ ना राम
मेरे हरी मोको भजें  तब पाऊं विश्राम 

प्रेम-प्रेम सब कोइ कहैं, प्रेम न चीन्है कोय
जा मारग साहिब मिलै, प्रेम कहावै सोय

कबीर लहरि समंद की मोती बिखरे आई.
बगुला भेद न जानई हंसा चुनी-चुनी खाई

भय से भक्ति करें सबै  भय से पूजा होए  
भय पारस है जीव को  निर्भय होए ना कोए  

शब्द बराबर धन नहीं जो कोई जाने बोल 
हीरा तो दामों मिलें  शब्द मोल ना तोल 

जब गुण को गाहक मिले तब गुण लाख बिकाई.
जब गुण को गाहक नहीं तब कौड़ी बदले जाई

साधु ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय
सार-सार को गहि रहै थोथा देई उड़ाय

हिन्दू कहें मोहि राम पियारा तुर्क कहें रहमाना
आपस में दोउ लड़ी-लड़ी  मुए मरम न कोउ जाना


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