सोमवार, 27 जनवरी 2025

कबीरा ते नर अन्ध हैं, गुरु को कहते और। Kabeera Te Nar Andh Hain, Guru Ko Kahate Aur

 

कबीरा ते नर अन्ध हैं, गुरु को कहते और। हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रुठै नहीं ठौर ॥

दोहा:

कबीरा ते नर अन्ध हैं, गुरु को कहते और।
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रुठै नहीं ठौर ॥

शब्दार्थ:

  • कबीरा: कबीरदास जी
  • ते: वे
  • नर: मनुष्य
  • अन्ध: अंधे, जो ज्ञान से अज्ञानी हैं
  • गुरु: शिक्षक, मार्गदर्शक
  • कहते: कहते हैं
  • और: और
  • हरि: भगवान
  • रूठे: नाराज होना
  • ठौर: स्थान, आसरा

अर्थ:
कबीरदास जी इस दोहे में यह संदेश दे रहे हैं कि जो व्यक्ति गुरु की महिमा और महत्व को समझने में असमर्थ हैं, वे अंधे की तरह होते हैं। वे कहते हैं कि यदि भगवान नाराज हो जाएं तो गुरु उनका आसरा होते हैं, लेकिन यदि गुरु नाराज हो जाएं तो किसी भी स्थान का कोई महत्व नहीं रह जाता।

व्याख्या:

पंक्ति 1: "कबीरा ते नर अन्ध हैं, गुरु को कहते और।
कबीरदास जी इस पंक्ति में यह संकेत दे रहे हैं कि जो लोग गुरु की वास्तविकता को नहीं समझ पाते, वे अंधे के समान होते हैं। अंधे का अर्थ है, जो किसी वस्तु या मार्ग को देख नहीं सकते, वही लोग गुरु के महत्व को नहीं पहचान पाते। उनका मन अज्ञानता से भरा होता है, और वे गुरु को केवल एक साधारण व्यक्ति के रूप में मानते हैं। ये लोग सत्य और ज्ञान के प्रति अज्ञानी होते हैं और उनका जीवन अंधकार में डूबा रहता है। गुरु का सही मूल्यांकन और आस्था जरूरी है ताकि जीवन में सही मार्गदर्शन प्राप्त हो सके।

पंक्ति 2: "हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रुठै नहीं ठौर।"
इस पंक्ति में कबीरदास जी यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि जब भगवान (हरि) नाराज होते हैं, तो गुरु ही हमारे लिए एक स्थान और आश्रय प्रदान करते हैं। भगवान से मिलन और मोक्ष की प्राप्ति गुरु के माध्यम से होती है। गुरु के बिना भगवान तक पहुंचना असंभव है। वहीं, यदि गुरु रुठ जाएं, तो हमारे जीवन में कहीं भी ठिकाना नहीं होता, क्योंकि गुरु के मार्गदर्शन से ही जीवन में सही दिशा मिलती है। गुरु के बिना जीवन में शांति और संतोष का अभाव रहता है।

समाप्ति:
कबीरदास जी ने इस दोहे के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि जीवन में गुरु का स्थान सर्वोपरि है। यदि गुरु हमारे जीवन में न हों, तो हम जैसे अंधे होते हैं, जो अपने मार्ग को नहीं देख सकते। गुरु ही हमें ज्ञान की रोशनी दिखाते हैं और जीवन को सही दिशा में ले जाते हैं। भगवान के नाराज होने पर गुरु ही हमारी रक्षा करते हैं, लेकिन यदि गुरु रुठ जाएं तो हमारा जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। इस प्रकार, हमें गुरु के प्रति अपनी श्रद्धा और आस्था बनाए रखनी चाहिए।

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