दोहा:
कबिरा माला मनहि की, और संसारी भेख।
माला फेरे हरि मिले, गले रहट के देख॥
शब्दों का अर्थ:
- कबिरा: यहां कबीर, भारतीय संत कवि और समाज सुधारक की ओर इशारा है।
- माला: यह माला एक साधना की चिह्न है, जिसका उपयोग साधक ईश्वर का नाम जपने के लिए करते हैं।
- मनहि: मन में या हृदय में।
- संसारी: संसार से संबंधित या सांसारिक जीवन।
- भेख: यह शब्द व्यक्ति के पहनावे और उसके बाहरी रूप से संबंधित है।
- फेरे: माला के मनकों को घुमाना।
- हरि: भगवान, ईश्वर का प्रतीक।
- गला: गला, गर्दन का एक हिस्सा।
- रहट: यह लकड़ी की एक मशीन होती है, जो पानी निकालने के काम आती है, जो आमतौर पर खेतों में होती है।
अर्थ: कबीर के इस दोहे में उन्होंने धार्मिक आस्थाओं और बाहरी दिखावे पर जोर देने वाले लोगों की आलोचना की है। कबीर जी का कहना है कि माला जपने से सच्ची भक्ति और आत्मा की शुद्धि नहीं होती। बाहरी रूप से जो धार्मिक आचरण या दिखावा करते हैं, वह कोई वास्तविक धर्म नहीं है। असली भक्ति तो मन में बसने वाली होती है, जो हर कार्य में ईश्वर का ध्यान और समर्पण लाती है।
व्याख्या:
पहली पंक्ति: "कबिरा माला मनहि की, और संसारी भेख।"
इस पंक्ति में कबीर जी कह रहे हैं कि माला तो केवल एक साधन है, जो मनुष्य को ध्यान में स्थिर रहने में मदद करती है, लेकिन यह केवल बाहरी दिखावा है। असली माला तो मन में होती है, यानी जब व्यक्ति का मन शुद्ध हो, तब वह वास्तविक भक्ति करता है। बाहर से धर्म का दिखावा करने से कोई लाभ नहीं होता। यदि मन में पवित्रता नहीं है, तो माला या भेष किसी काम का नहीं है। कबीर जी ने यह स्पष्ट किया कि आत्मा की शुद्धि और भगवान के प्रति प्रेम को बाहरी आडंबरों से नहीं जोड़ा जा सकता।
दूसरी पंक्ति: "माला फेरे हरि मिले, गले रहट के देख॥"
कबीर जी दूसरी पंक्ति में यह कह रहे हैं कि अगर माला के मनकों को घुमाने से ईश्वर मिलते तो गले में रहट जैसा यंत्र लगाने से भी ईश्वर मिल जाते। उन्होंने यहां साधारण शब्दों में बताया कि ईश्वर की प्राप्ति केवल बाहरी दिखावे से नहीं होती, बल्कि वह सच्चे भक्ति और समर्पण के माध्यम से होती है। जैसे रहट के गले में लगे होने से कोई नदियों से पानी निकाल सकता है, वैसे ही अगर कोई बिना सच्चे भक्ति के साधन पर जोर दे, तो यह केवल दिखावा होता है।
कुल मिलाकर, कबीर जी का यह दोहा हमें यह समझाता है कि असली भक्ति तो केवल मन में होती है।
धार्मिक आस्थाओं और साधनाओं का महत्व केवल तब तक है जब तक वे सच्चे मन से की जाती हैं। किसी भी धर्मिक कर्म को बिना सच्चे भाव के करना केवल छलावा है। कबीर जी का संदेश था कि हर व्यक्ति को आत्मा की शुद्धि की ओर अग्रसर होना चाहिए, क्योंकि असली भक्ति मन से जुड़ी होती है, न कि बाहरी आडंबरों से।
समाप्ति:
कबीर जी के इस दोहे में हमें यह शिक्षा मिलती है कि धर्म का सही मतलब है आत्मिक शुद्धि और ईश्वर के प्रति सच्चा प्रेम। केवल बाहरी रूप से धर्मिक कार्य करने से ईश्वर की प्राप्ति नहीं होती। हमें अपने भीतर के संसार की सफाई करनी चाहिए। कबीर जी ने हमें अपने मन की माला पर ध्यान केंद्रित करने का संदेश दिया।

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