दोहा:
अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप।
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।
अर्थ और व्याख्या:
शब्दार्थ:
- अति: आवश्यकता से अधिक, अतिरेक
- भला: अच्छा
- बोलना: कहना, वार्तालाप करना
- चूप: चुप रहना
- बरसना: बारिश होना
- धूप: सूर्य का प्रकाश और गर्मी
व्याख्या:
यह दोहा संत कबीर द्वारा जीवन में संतुलन और संयम के महत्व को दर्शाने के लिए कहा गया है। इसमें ‘अति’ यानी किसी भी चीज़ की अधिकता को हानिकारक बताया गया है। संत कबीर का कहना है कि किसी भी वस्तु, व्यवहार, या स्थिति में अति होना नुकसानदायक हो सकता है। वे यह संदेश देते हैं कि जीवन में संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।
अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप:
यहाँ पर ‘बोलना’ और ‘चूप’ दो परस्पर विरोधी क्रियाएं हैं। कबीर कहते हैं कि अधिक बोलना अच्छा नहीं है क्योंकि अधिक बोलने से कभी-कभी व्यक्ति ऐसी बातें कह जाता है, जो दूसरे को चोट पहुँचा सकती हैं या उसका स्वयं का अनादर करवा सकती हैं। वहीं, अधिक चुप रहना भी सही नहीं है क्योंकि इससे व्यक्ति के विचार और भावनाएं दब जाती हैं, जिससे उसके व्यक्तित्व और संबंधों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसलिए, बोलने और चुप रहने के बीच संतुलन बनाए रखना चाहिए। न तो हर समय बोलते रहें और न ही हमेशा चुप रहें।अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप:
प्रकृति के दो महत्वपूर्ण तत्व - वर्षा और धूप - का उदाहरण देकर कबीर यह समझाने का प्रयास करते हैं कि इनकी अति भी हानिकारक हो सकती है। आवश्यकता से अधिक वर्षा होने पर बाढ़ आ सकती है, जो फसलों और जीवन को नुकसान पहुँचाती है। वहीं, अत्यधिक धूप से सूखा पड़ सकता है, जिससे भूमि बंजर हो जाती है और जीवन प्रभावित होता है। अतः, जैसे प्रकृति का संतुलन आवश्यक है, वैसे ही जीवन के हर क्षेत्र में संतुलन बनाए रखना ज़रूरी है।
संदेश:
इस दोहे के माध्यम से कबीर हमें यह सिखाते हैं कि जीवन में किसी भी चीज़ की अति, चाहे वह बोलना हो, चुप रहना हो, या प्रकृति के तत्व हों, लाभकारी नहीं है। हमें हर क्षेत्र में मध्यम मार्ग अपनाना चाहिए।
- अधिक बोलने से विवाद और समस्याएं बढ़ती हैं, जबकि अधिक चुप रहने से व्यक्तित्व दब जाता है।
- अत्यधिक वर्षा और धूप से प्रकृति का संतुलन बिगड़ता है, वैसे ही जीवन में किसी भी चीज़ की अधिकता से सुख और शांति खत्म हो जाती है।
निष्कर्ष:
संत कबीर का यह दोहा हमें सिखाता है कि संतुलन और संयम जीवन के हर पहलू में आवश्यक हैं। ‘अति’ को त्यागकर हम न केवल अपने जीवन को सुखमय बना सकते हैं, बल्कि दूसरों के साथ भी मधुर संबंध बना सकते हैं। संतुलित जीवन ही सच्चे सुख और शांति का आधार है।

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