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शुक्रवार, 24 जनवरी 2025

 



कबीर सो धन संचे, जो आगे को होय।

सीस चढ़ाए पोटली, ले जात न देख्यो कोय।।



कबीरदास जी की यह साखी हमारे जीवन को एक गहरी शिक्षा देती है। इसका अर्थ है कि हमें ऐसा धन संचित करना चाहिए जो हमारे भविष्य के लिए उपयोगी हो और आध्यात्मिक रूप से हमें लाभ दे। सांसारिक धन, संपत्ति, और वस्त्र केवल इस भौतिक संसार में ही सीमित रहते हैं। मृत्यु के बाद, यह सब यहीं रह जाता है और मनुष्य खाली हाथ जाता है।

इस साखी में कबीरदास जी यह संदेश दे रहे हैं कि भौतिक धन का संग्रह करने में अपना पूरा जीवन बर्बाद मत करो। संसार में जितने भी धन, संपत्ति और वैभव हैं, वे केवल इस जीवन तक सीमित हैं। जब मनुष्य इस संसार को छोड़कर जाता है, तो वह अपने साथ कुछ भी नहीं ले जा सकता।

कबीर जी यहाँ "धन" शब्द को आध्यात्मिक दृष्टिकोण से परिभाषित कर रहे हैं। यह धन सत्य, धर्म, भक्ति, परोपकार, और सद्गुण हैं। ऐसे गुण और कर्म ही मृत्यु के बाद हमारे साथ जाते हैं और आत्मा को मुक्ति प्रदान करते हैं। सांसारिक धन जैसे सोना, चांदी, या जमीन-जायदाद मृत्यु के समय काम नहीं आते।

"सीस चढ़ाए पोटली" का अर्थ है कि मनुष्य अपने जीवन के अंत में चाहे कितनी भी दौलत अपने सिर पर उठाए, उसे वह परलोक में नहीं ले जा सकता। यह एक कटाक्ष है उन लोगों पर, जो केवल सांसारिक संपत्ति के पीछे भागते हैं और आत्मा की शुद्धि की ओर ध्यान नहीं देते।

कबीरदास जी इस साखी के माध्यम से हमें यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि हमें अपनी प्राथमिकताएं बदलनी चाहिए। हमारा ध्यान केवल भौतिक सुखों पर नहीं बल्कि आध्यात्मिक सुख और आत्मा की उन्नति पर होना चाहिए।

इस साखी का व्यावहारिक संदेश यह है कि हमें अपने जीवन में संतुलन बनाना चाहिए। सांसारिक जिम्मेदारियों को निभाने के साथ-साथ हमें अच्छे कर्म करने चाहिए, सच्चाई का मार्ग अपनाना चाहिए और अपने अंदर आध्यात्मिक गुणों का विकास करना चाहिए।

यदि हम केवल धन और सांसारिक चीज़ों के पीछे भागते रहेंगे, तो अंत में हमें खाली हाथ रहना पड़ेगा। लेकिन यदि हम सत्य, प्रेम, और धर्म के रास्ते पर चलेंगे, तो हमें न केवल इस जीवन में शांति मिलेगी, बल्कि परलोक में भी हमारी आत्मा को मुक्ति और शांति प्राप्त होगी।

इसलिए कबीरदास जी हमें प्रेरित करते हैं कि हम ऐसा धन संचित करें जो हमारे आत्मिक जीवन को समृद्ध बनाए। सांसारिक वस्त्र और संपत्ति तो नाशवान हैं, लेकिन अच्छे कर्म और आध्यात्मिक ज्ञान अमर हैं। यही हमारे जीवन का वास्तविक धन है।

रविवार, 10 जुलाई 2016

Sant Kabir Das



  संत कबीर दास


kabir das ji


हिंदी साहित्य का भक्ति काल 1375  से 1700  तक माना जाता है यह हिंदी साहित्य का सुवर्णीय यूग माना जाता   है, इस ही काल में निर्गुण भक्ति की ज्ञानाश्रयी शाखा के मुख्य कवियों में से एक है  संत श्री कबीर दास जी 


इन  के जन्म के बारे में निचित  नहीं  कहा जा सकता  है इन का  जन्म संवत 1456 के आसपास कशी में  हुआ था 


ऐसा कहा गया है के  श्री रामानन्द स्वामी ने भूल से एक  विधवा ब्राह्मणी का पुत्रवती होने का आशीर्वाद दिया था ब्राह्मणी ने  उस नवजात शिशु को लहरतारा ताल के पास छोड़  आयी वही नीरू और नीमा नामक जुलाहा जो के मुस्लिम थे उस  बच्चे  को उठाया  और उसका पालन किया जो आगे चल के संत कबीर दास जी कहलाए

जाति जुलाहा नाम कबीरा
बनि बनि फिरो उदासी



संत कबीरदास जी भक्ति कालीन कवि थे, यह कहना गलत न होगा के व् एक क्रांतिकारी, समाज सुधारक और निर्गुण ईश्वर भक्त थे,उन्होंने अपने दोहो, कविताओ का प्रयोग  समाज सुधार व् समाज में फैले पाखण्ड, आडंबरों  तथा भ्रान्तियों को दूर करने के लिए  किया हालाँकि  कबीर जी ने कहीं से भी शिक्षा ग्रहण नहीं की थी 

मसि कागद छूवो नहीं, कलम गही नहिं हाथ


कहते हैं कि, उन्हें अक्षर ज्ञान भी नहीं था । फिर भी उनकी कविता दोहे इतने प्रभावी थे की सीधे दिल और दिमाग में छा जाते बैठे  जाते है  न केवल उस काल में बल्कि  आज भी  उतना ही असर रखते है 

कबीरदास जी की रचनाएँ सखी , सबद और बीजक में  उपलब्द है कबीर जी ने अपनी रचनाओं में में खड़ी बोली, पंजाबी, गुजराती, राजस्थाना ब्रज तथा अवधि के शब्द प्रयोग किया है 

उस समय ऐसा  माना  जाता था के  काशी में मृत्यु होने से स्वर्ग और मगहर नामक स्थान में मृत्यु होने से नर्क मिलता है इस अंधविश्वास को समाप्त करने के उद्देश्य से कबीरदास जी मृत्यु से पहले मगहर चले गए और वहीं उनका देहान्त हो गया 




SANT KABIR DASS JI





उन्होंने भी जान कर ही कहा है, औरों ने भी जानकर ही कहा है-लेकिन कबीर के कहने का अंदाजे बयां, कहने का ढंग, कहने की मस्ती बड़ी बेजोड़ है। ऐसा अभय और ऐसा साहस और ऐसा बगावती स्वर, किसी और का नहीं है।   OSHO 

sant kabir dass
Sant Kabir Dass





संत कबीर दास के दोहे


हिन्दू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना

आपस में दोउ लड़ी-लड़ी  मरे, मरम न जाना कोई

मरम = भेद 


परनारी का राचणौ, जिसकी लहसण की खानि

खूणैं बेसिर खाइय, परगट होइ दिवानि

परनारी = दूसरी नारी ,पराई औरत  
खूणैं बेसिर = कोने में बैठ के 


केस कहा बिगडिया, जे मुंडे सौ बार
  मन को काहे न मूंडिये, जा में विशे विकार


केस = बाल , मुंडे = सर के सारे बाल साफ करना 
जा में विशे विकार= जिस में अच्छे विचार न हो 


माटी कहे कुम्हार से तू क्या रौंदे मोय 
एक दिन ऐसा आएगा मैं रौंदूगी तोय 


साईं इतना दीजिए जा मे कुटुम समाय
मैं भी भूखा न रहूं साधु ना भूखा जाय


बडा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर
पंथी को छाया नहीं फल लागे अति दूर


बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिलिया कोय
जो मन  खोजा आपना मुझसे बुरा न कोय


पोथी पढ़ - पढ़ जग मुआ भया न पंडित कोय
ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय


माला फेरत जुग भया फिरा न मन का फेर
कर का मनका डार दे मन का मनका फेर

कर = हाथ , डार = छोड़ 

जात  न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान

म्यान = जिस में तलवार रखी जाती है 


जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ
मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ

गहरे पानी पैठ = गहरे पानी का तला,    बपुरा = बेचारा 

बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि
हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि


अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप

चूप = चुप रहना, 

धीरे-धीरे रे मना,धीरे सब कुछ होय

माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय

धीरे-धीरे रे मना = अपने मन को धीरे-धीरे मनाए (समझाए )
माली सींचे सौ घड़ा = माली कई 100  घड़े पानी से पेड़ को पानी देता है 


निंदक नियरे राखिए, आँगन  कुटी छवाय
बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय


आँगन  कुटी छवाय = आँग में कुटिया बना के देना 
सुभाय = सुभाव 


दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार
तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार

दुर्लभ = जो कठिनता से प्राप्त होता हो
तरुवर = पेड़

बहुरि न लागे डार = फिर से डाल पर नही लगता 

कबीरा खड़ा बाज़ार में, मांगे सबकी खैर
ना काहू से दोस्ती,न काहू से बैर
बैर = दुश्मनी 


हाड़ जलै ज्यूं लाकड़ी, केस जलै ज्यूं घास
तन जलता देखि करि, भया कबीर उदास 
हाड़ = हड्डिया , केस = बाल 




कबीर तन पंछी भया, जहां मन तहां उडी जाइ
जो जैसी संगती कर, सो तैसा ही फल पाइ  


तन को जोगी सब करें, मन को बिरला कोई
सब सिद्धि सहजे पाइए, जे मन जोगी होइ  


माया मुई न मन मुआ, मरी मरी गया शरीर 
आशा  तिर्ष्णा  न मुई, यों कही गए कबीर 


stachu sant kabir das


कबीर तीनो  लोक सब राम जपत हें, जान मुक्क्ति को धाम
राम चन्द्र वसिष्ट गुरु किया तिन कहि सुनायो नाम

कबीर तीन लोक पिंजरा भया, पाप पुण्य दो जाल
सभी जीव भोजन भये, एक खाने वाला काल

कबीर मानुष जन्म पाय कर, नहीं रटे हरी नाम
जैसे कुआँ जल बिना खुदवाया किस काम


चलती चक्की देखकर दिया कबीरा रोय
 दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय


साधू कहावन कठिन है लम्बा पेड़ खजूर
चढ़े तो चखे प्रेम रस गिरे तो चकनाचूर

आए है तो जाएगे राजा रंक फाकिर 
एक सिंहासन चढी चले एक बाधे जंजिर



कबीर कहा गरबियो काल गहे कर केस
ना जाने कहाँ मारिसी कै घर कै परदेस

कंकड़ पत्थर जोड़कर  मस्जिद लियो बनाये 
चढ़ कर मुलाह बांग दे  क्या बहरा हुआ खुदाए 

कबिरा गरब न कीजिये कबहूँ न हंसिये कोय
अबहूँ नाव समुद्र में का जाने का होय

काल करे सो आज कर आज करे सो अब
पल में प्रलय होएगी बहुरि करेगो कब

कुटिल वचन सबतें बुरा जारि करै सब छार
साधु वचन जल रूप है बरसै अमृत धार

धीरे-धीरे रे मना धीरे सब कुछ होय,
माली सींचे सौ घड़ा ॠतु आए फल होय

देवी बड़ी ना देवता  सूरज बड़ा ना चन्द 
आदि अंत दोनों बड़े  के गुरु के गोविन्द 


माला फेरूँ ना हरी भजूं मुख से कहूँ ना राम
मेरे हरी मोको भजें  तब पाऊं विश्राम 

प्रेम-प्रेम सब कोइ कहैं, प्रेम न चीन्है कोय
जा मारग साहिब मिलै, प्रेम कहावै सोय

कबीर लहरि समंद की मोती बिखरे आई.
बगुला भेद न जानई हंसा चुनी-चुनी खाई

भय से भक्ति करें सबै  भय से पूजा होए  
भय पारस है जीव को  निर्भय होए ना कोए  

शब्द बराबर धन नहीं जो कोई जाने बोल 
हीरा तो दामों मिलें  शब्द मोल ना तोल 

जब गुण को गाहक मिले तब गुण लाख बिकाई.
जब गुण को गाहक नहीं तब कौड़ी बदले जाई

साधु ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय
सार-सार को गहि रहै थोथा देई उड़ाय

हिन्दू कहें मोहि राम पियारा तुर्क कहें रहमाना
आपस में दोउ लड़ी-लड़ी  मुए मरम न कोउ जाना


postal stump sant kabir dass